तुलसी की कहानी
तुलसी की कहानी
पौराणिक कथा के अनुसार, तुलसी देवी को भगवान विष्णु की परम भक्त माना जाता है। उनका जन्म एक धर्मपरायण कन्या के रूप में हुआ था। तुलसी देवी बचपन से ही भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना में लीन रहती थीं। कहते हैं कि उनका पूर्व जन्म “वृंदा” नामक राक्षस कुल की स्त्री का था, जो परम धार्मिक और पतिव्रता थीं।
वृंदा का विवाह जलंधर नामक राक्षस से हुआ, जो अपने पराक्रम और तप से अजेय हो गया था। उसकी शक्ति का मूल कारण वृंदा की पतिव्रता धर्म और भगवान विष्णु की भक्ति थी। देवताओं ने जलंधर को हराने के लिए भगवान विष्णु से सहायता मांगी। भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रत धर्म खंडित कर दिया, जिससे जलंधर कमजोर होकर युद्ध में मारा गया।
जब वृंदा को यह सत्य ज्ञात हुआ, तो वह क्रोधित हो गईं और भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वे पत्थर बन जाएंगे। इस श्राप के प्रभाव से भगवान विष्णु “शालिग्राम” के रूप में परिवर्तित हो गए। पश्चाताप से व्यथित वृंदा ने अपना शरीर त्याग दिया। उनकी भक्ति और पवित्रता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें “तुलसी” के रूप में अमर कर दिया।
भगवान विष्णु ने तुलसी को यह वरदान दिया कि वह संसार में पूजनीय होंगी और उनकी पूजा बिना तुलसी के अधूरी मानी जाएगी। तब से तुलसी देवी को पवित्रता, भक्ति और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है।
आज भी तुलसी को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व दिया जाता है। इसे हर घर में लगाया जाता है, और तुलसी के पत्तों को भगवान विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की पूजा में उपयोग किया जाता है। इस प्रकार, तुलसी न केवल एक पौधा है, बल्कि पवित्रता और भक्ति का जीता-जागता प्रतीक है।
- तुलसी पूजा का मूल मंत्र
_”त्वं तुलसी नमस्तुभ्यं नमो विष्णुप्रिया शुभे।
नमो मूक्ष प्रदायिनी पुण्ये सर्व ग्रह निवारिणि॥”_
(अर्थ: हे तुलसी माता! आपको नमस्कार है। आप भगवान विष्णु की प्रिय हैं, मोक्ष प्रदान करने वाली और सभी कष्टों को हरने वाली हैं।)
तुलसी के दिव्य गुणों का स्तुति मंत्र
_”यन्मूले सर्वतीर्थानि यन्मध्ये सर्वदेवताः।
यदग्रे सर्ववेदाश्च तुलसीं तां नमाम्यहम्॥”_
(अर्थ: जिसके मूल में सभी तीर्थ, मध्य में सभी देवता, और अग्रभाग में सभी वेद हैं, उस तुलसी को मैं प्रणाम करता हूँ।)
तुलसी विवाह का मंत्र
_”त्वामाराध्य तुलसी श्रीहरिं प्रियतां कुरु।
सदा मंगलदात्री त्वं पूज्यसे सर्वसिद्धये॥”_
(अर्थ: हे तुलसी माता! आपकी पूजा करके भगवान श्रीहरि को प्रसन्न करें। आप सदा मंगलमयी हैं और सिद्धि प्रदान करती हैं।)
तुलसी से प्रार्थना मंत्र
_”त्वं शुद्धा शुद्धिकर्त्री च निर्मला शुभदायिनी।
आयुर्धनं यशः कीर्तिं देहि मे तुलसी सदा॥”_
(अर्थ: हे तुलसी माता! आप शुद्ध, शुद्धिकारी और शुभ देने वाली हैं। कृपया मुझे आयु, धन, यश, और कीर्ति प्रदान करें।)
तुलसी के पत्तों का मंत्र
_”मां तुलसी नमस्तुभ्यं विष्णोः प्रिया सती।
नमः सर्वघनाशाय नित्यायारोग्यमंगलम्॥”_(अर्थ: हे मां तुलसी! भगवान विष्णु की प्रिय, सती तुलसी माता को प्रणाम। आप सभी दोषों को नष्ट करने वाली और आरोग्य व मंगल प्रदान करने वाली हैं।)



